बिहार     भोजपुर     उद्वन्‍त नगर


इकाइयों के ऐसे भौगोलिक जमाव (नगर/शहर/कुछ सटे गांव और उनसे लगते हुए क्षेत्र) को क्लस्टर (जमघट) कहते हैं, जो लगभग एक ही तरह के उत्पाद तैयार करते हैं तथा जिन्हें समान अवसरों और खतरों का सामना करना पड़ता है| हस्तशिल्प/हथकरघा उत्पादों को तैयार करने वाली पारिवारिक इकाइयों के भौगोलिक जमाव (जो अधिकांशतः गांवों/कस्बों में पाया जाता है) को आर्टिशन क्लस्टर कहते हैं| किसी क्लस्टर विशेष में, ऐसे उत्पादक प्रायः किसी खास समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, जो पीढियों से इन उत्पादों को तैयार करने के कार्य में लगे होते हैं| दरअसल, कई आर्टिशन क्लस्टर (शिल्पी जमघट) सदियों पुराने हैं|

उद्वन्‍त नगर  समूह के बारे में:-

उद्वन्‍त नगर समूह बिहार राज्‍य में भोजपुर जिला के अर्न्‍तगत आता है.

उद्वन्‍त नगर समूह 200 से अधिक कलाकारों तथा 10 एसएचजी आकार सहित सशक्‍त कार्यबल आधार प्रदान करने में सक्षम है. यह संघटन दिन प्रति दिन पहचान प्राप्‍त कर रहा है.

कढ़ाई :-

बिहार में कसीदाकारी माता से पुत्री तक शिल्‍प के रूप में हस्‍तांतरित होती रही है. बिहार की ज्‍यामि‍त्तीय आकृतियों कशीदे की कशीदाकारी मैसूर की कसौटी कशीदाकारी के समान दिखाई देती है और अनेक शैलियों में पाई जाती है. जरी (धातु के धागे की) कशीदाकारी चांदी एवं स्‍वर्ण धागे दोनों में की जाती है जिसमें पक्षियों, पत्तों, एवं अन्‍य अनेक वस्‍तुओं के चित्र होते हैं.


सुजनी एक विलक्षण शिल्‍प है जो पुरानी पहनी गई साडियों से बनाई जाती है. साडियों की एक साथ सफेद धागे से सिलाई की जाती है और तब रजाई बनाई जाती है. सजीव आकृतियां निर्मित करने के लिए रजाई के मध्‍य भाग में रंगीन धागों से सिलाई की जाती है. तागानुआ, कशीदाकारी है जो धागों की गणना से की जाती है. कटवा, बिहार का गोट्टा-पट्टा पैबन्‍द कार्य, व्‍यक्तिगत पहनावे के अतिरिक्‍त तम्‍बुओं पर पाया जाता है.


मिथिला क्षेत्र में नवयुवतियां ढकने के कपड़ों तथा बच्‍चों के पहनावे पर (हाथ से बुने हुए विरंजित कपड़े पर लाल, नीले काले रंग में ) मुख्‍यत: लोक या धार्मि‍क आकृतियों के साथ-साथ धारियों, रेखाओं तथा पशु आकृतियों सहित कशीदाकारी की जाती है. अने वस्‍त्रों पर शीशे का कार्य किया जाता है औरइन शीशों को सूती, सिल्‍क या कृत्रिम धागे प्रयोग कर जंजीर सिलाई से आधार प्रदान किया जाता है.

 

कढ़ाई शब्द का मूल रूप से अर्थ है सुई और धागे के प्रयोग से कपडे के किसी टुकड़े को आकार या आकर्षक बनाना या काल्पनिक वर्णनों से उसकी सजावट करना. अतः कढ़ाई सुई और धागे के उपयोग से कपडे को सजाने की कला है. के साथ है ज़ेब सजा वस्त्रों की कला एक के रूप में माना जाता है. बिहार की कढ़ाई ने अपने कलाकारों की बहुमुखी प्रतिभा के कारण इसकी ख्याति अर्जित की है. बिहार के कलाकार कारीगर इस्तेमाल करते हैं. कढ़ाई के काम के लिए सबसे महत्वपूर्ण केन्द्रों में भोजपुर और पटना क्षेत्र हैं जो अपनी रचनात्मक उ त्कृष्टता के लिए प्रशंसित हैं. बिहार की कढ़ाई दूसरे बहुत से समुदायों के लिए भी आय का जरिया है. आज भी, जब कढ़ाई, कपड़े सजाने के सबसे पारंपरिक तरीकों में से है, यह अभी भी उतना ही लोकप्रिय है. डिजाइन प्राचीन काल की हो या आधुनिक ज्यामितीय तरीके की, कढ़ाई का अर्थ कपड़ों को सजाने का एक सामान्य तरीका ही है. बल्कि आज के परिप्रेक्ष्य में विशेषज्ञों का मानना है कि अब कढ़ाई में स्वीकार्यता की वजह से रचनात्मकता और नए प्रयोगों की अधिक गुंजाईश है.



इसमें टिकड़ीयों तथा मनकों का अलंकरण होता है, जो उन्‍हें आकर्षक बनाता है. इस प्रकार की कशीदाकारी एक लकड़ी स्‍तम्‍भ के चौखटे पर की जाती है. वस्‍त्र पर लंबी सूई, धागे, टिकड़ीयों तथा मनकों के साथ कार्य किया जाता है. विभिन्‍न आकारों के चौखटे, प्राय: कपड़े की सुरक्षा के लिए जिस पर स्‍टेंसिल की सहायता से डिजाइन आरेखित किया जाता है, लगभग 1.5 फुट ऊँचाई के प्रयुक्‍त किए जाते हैं. एक हाथ कपड़े के नीचे धागे को सूई के लिए सुरक्षित करता है जबकि‍ दूसरा हाथ सूई को कपड़े के ऊपर सुगमता से ले जाता है. सूई की सहायता से कपडे पर सजावटी टिकड़ीयां तथा मनके लगाए जाते हैं.



एक और कढ़ाई पैटर्न ज्यामितीय या पुष्प आकृतियों में जाली या फंसाने वाली कढ़ाई है और यह ताना और बाना के धागे को खींचकर उन्हें सूक्ष्म बटन के छेद बराबर सिलाइयों में फंसा कर की जाती है. परिष्कृत उत्पादों में घर के उपयोग के लिए चीज़ें जैसे परदे, चादरें, फर्नीचर के कवर और पोशाकें शामिल हैं

कच्चा सामग्री:-

कपड़े पर लंबी सुई, धागे, तिक्रिस और मोती का काम होता है. इस प्रकार की सजावट लकड़ी के एक शहतीर के ढांचे पर किया जाता है. कपड़े पर एक लंबी सुई, धागे, तिक्रिस और मोती से काम किया जाता है. इसमें कई आकार के ढांचों का उपयोग किया जाता है, कपड़े को सुरक्षित रखने के लिए आमतौर पर 1.5 फीट ऊँचे ढांचे का जिस पर डिजाइन एक स्टैंसिल के साथ बनाया जाता है. एक हाथ कपड़े के नीचे सुई से डाले जा रहे धागे को सुरक्षित रखता है तो दूसरा सुई को कपड़े के ऊपर आसानी से चलता है. सजावटी तिक्रिस और मोती सुई से कपड़े में लगाये जाते हैं.

प्रक्रिया:-

कढ़ाई कोई तकनीकी कला नहीं है की इसके लिए कोई विशेष प्रक्रिया हो लेकिन फिर भी इसकी एक छोटी सी प्रक्रिया है :

1.आकृति खाका की तरह सममित अंकन और एकरूपता के लिए अनुरेखण स्क्रीन पर बनायी जाती है.

2. कढ़ाई के काम के लिए रूपांकन अंकन मिक्सर (तरल) के साथ कपड़े पर चिह्नित करते हैं.

3. अब चिह्नित कपड़ों (साड़ी, ड्रेस सामग्री, आदि) को लकड़ी के फ्रेम पर सभी दिशाओं से बहुत कस कर सेट किया जाता है (यह बिना फ्रेम के भी किया जा सकता है).

4.यह कढ़ाई करने को आसान कर देगा क्योंकि फ्रेम की मदद से खिंचाव कम होगा और बिना किसी सिकुड़न का उत्पाद बनेगा.

5. इच्छित आकृति बड़े करीने से व विभिन्न प्रकार की सिलाइयों (पक्को,कच्चो,सूफ,रबारी, खरेक आदि) से प्राप्त की जाती है.

6. परिणाम कई रंगों में होगा और बनाने में आसान है.

कपड़े को (साड़ी, कपड़ा, सामग्री, आदि) लकड़ी के फ्रेम ( यह फ्रेम के बिना भी किया जा सकता है) पर उत्पाद के लिए इच्छित छूट के साथ डिजाइन के अनुसार पर सेट करो. आकृति खाका की तरह सममित अंकन और एकरूपता के लिए अनुरेखण स्क्रीन पर बनायी जाती है. आकृति तरल (केरोसीन और गली पावडर) स्वरुप के एक चिन्हित करने वाले मिश्रण से चिन्हित किया जाता है. कढ़ाई के लिए इच्छित आकृति विभिन्न तरीके से सिलाई करके और सफाई से कढ़ाई कर के प्राप्त की जाती है.

कढ़ाई के डिजाइन बटन के छेद के आकार की सिलाई की मदद से छोटे गोल आकार के शीशे सामग्री में जोड़ कर तैयार किये जाते हैं. फिक्सिंग फंदा टांका की मदद से सामग्री के लिए आकार का दर्पण द्वारा तैयार कर रहे हैं, आउटलाइन हाथ से खाका बाना कर दर्शायी जाती है. मुलायम धागे का इस्तेमाल स्टेम या हेरिन्गाबों की सिलाई में करीब से किया जाता है. गाढ़ी पृष्ठभूमि में फूल और धीरे धीरे बढ़ना आदर्श हैं.

तकनीक:-

तकनीक समुदाय और क्षेत्र के हिसाब से बदलती है.कढ़ाई शब्द दरअसल कपड़े के किसी टुकड़े को सुई के काम से सजाने या तफसील में सजावट करने का ही नाम है. इस प्रकार कढ़ाई सज्जा सुई और धागे से कपड़ों को सजाने की कला है. इसमें हाथ और मशीन से कढ़ाई के तरीके शामिल हैं. और अब तक हाथ से की जाने वाली कढ़ाई महंगी और समय लेने वाली पद्धति है. फिर भी इसे पसंद किया जाता है क्योंकि इसमें हाथ से किया हुआ सघन और पेंचदार काम होता है.

एक कढ़ाई करने वाला निम्नलिखित बुनियादी तकनीकों का उपयोग करता है:-

1. क्रॉस सिलाई

2. क्रिवेल काम

3. रजाई बनाना

कैसे पहुचे :-

पटना को अच्‍छी प्रकार रखरखाव की गई सड़कों के जाल से जुड़े होने की सुविधा प्राप्‍त है. राष्‍ट्रीय राजमार्ग सं. 31 दीनापुर, पटना तथा पटना शहर से गुजरता है. एक शाखा बाढ़ से होकर बरौनी जाती है, जबकि दूसरी बिहार से होकर नवादा को जाती है. पूर्वी रेलवें की मुख्‍य लाइन जिले की संपूर्ण लम्‍बाई में गंगा के सानान्‍तर होते हुए गुजरती है. जिला में तीन रेलवे लाइनें अर्थात पटना गया शाखा लाइन,  फतवाह-इस्‍लामपुर छोटी रेलवे तथा बख्तियारपुर-राजगीर शाखा लाइन उत्तर से दक्षिण की ओर गुजरती हैं. पटना कलकत्ता एवं दिल्‍ली तथा कुछ अन्‍य स्‍थानों से दैनिक उड़ानों द्वारा जुड़ा हुआ है. एक विमानपत्तन फुलवारीशरीफ के निकट है और दूसरा बिहटा में है.








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